NCERT Imp Questions for Class 12 Sociology Indian Society Chapter 2 भारतीय समाज की जनसांख्यिकीय संरचना [The Demographic Structure of Indian Society] (Hindi Medium)

अध्याय 2 भारतीय समाज की जनसांख्यिकीय संरचना [The Demographic Structure of Indian Society]

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहु-विकल्पीय प्रश्न

1. जनांकिकी शब्द का प्रयोग सबसे पहले जिस लेखक द्वारा किया गया, उसका नाम है

(A) सोरोकिन,

(B) माल्थस

(C) गुइलॉर्ड,

(D) कॉम्टे।

2. भारत में प्रतिवर्ष जनसंख्या में लगभग कितनी वृद्धि हो जाती है ?

(A) 1-50 करोड़,

(B) 1-70 करोड़,

(C) 1-90 करोड़,

(D) 2.10 करोड़।

3. भारत में सर्वप्रथम किस वर्ष में जनगणना शुरू की गई ?

(A) सन् 1870,

(B) सन् 1872,

(C) सन् 1891,

(D) सन् 1901.

4. भारत में पहली राष्ट्रीय जनसंख्या नीति किस सन् में घोषित की गई ?

(A) सन् 1980,

(B) सन् 1960,

(C) सन् 1976,

(D) सन् 1965.

5. जनसंख्या की दृष्टि से चार सबसे बड़े राज्य कौन-से हैं ?

(A) उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार, सिक्किम,

(B) उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, गोवा,

(C) उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार, पश्चिम बंगाल,

(D) उत्तर प्रदेश, केरल, बिहार, गोवा।

6. जनगणना 2011 का शुभंकर क्या था ?

(A) प्रगणक देश,

(B) प्रगणक शिक्षिका,

(C) प्रगणक वाक्य,

(D) प्रगणक अनुशासन

7. भारत की जनसंख्या विश्व की जनसंख्या का कितना प्रतिशत है ?

(A) 15.5.

(B) 17-5,

(C) 19.5,

(D) 21-5.

8. जनसंख्या संवृद्धि दर का तात्पर्य है

(A) जन्म-दर और मृत्यु दर के बीच का अन्तर,

(B) स्त्री एवं पुरुष के बीच का अन्तर,

(C) ग्रामीण एवं नगरीय जनसंख्या के बीच का अन्तर

(D) उपर्युक्त में से कोई नहीं।

9. भारत का लिंगानुपात कितना है ?

(A) 930,

(B) 933,

(C) 940,

(D) 943.

10. भारत में कुल कितने प्रतिशत लोग साक्षर हैं ?

(A) 71%,

(B) 72%,

(C) 73%,

(D) 74%.

उत्तर- 1. (C), 2. (B), 3. (B), 4. (C), 5. (C), 6. (B) 7. (B) 8. (A), 9. (C), 10. (D)..

रिक्त स्थान पूर्ति

1. जनांकिकी में……………………. और जनसंख्या अध्ययन के संख्यात्मक और गुणात्मक पक्षों का अध्ययन किया जाता है।

2. आदर्श जनसंख्या सिद्धान्त को…………………… भी कहते हैं।

3. भारत की राष्ट्रीय जनसंख्या नीति, 2000 के अनुसार सन्…………………..जनसंख्या स्थिरता प्राप्त करने का लक्ष्य है।

4. भारत में जनसंख्या वितरण में…………………….है।

5. भारत में जनसंख्या वृद्धि का सबसे प्रमुख कारण जन्म-दर की तुलना में मृत्यु दर……………………….होना है।

6. संसार की कुल जनसंख्या का प्रतिशत हिस्सा भारत में निवास करता है।

उत्तर- 1. जनांकिकी विश्लेषण, 2. माल्वस सिद्धान्त, 3. 2045, 4. विषमता, 5. कम, 6. सोलह।

सत्य / असत्य

1. जनसंख्या संरचना का बहुत बड़ा सरोकार सामाजिक और आर्थिक कारकों से है।

2. भारत की जीवन प्रत्याशा विगत वर्षों में घटी है।

3. ऊँची मृत्यु दर अर्द्ध- विकसित अर्थव्यवस्था का संकेतक है।

4. जनसंख्या के तीन महत्वपूर्ण घटक जन्म-दर, मृत्यु दर और प्रवास

5. नैसर्गिक प्रतिबन्ध प्रो. डॉल्टन की अवधारणा है।

6. परिवार नियोजन जनसंख्या नियन्त्रण का प्रमुख उपाय है।

उत्तर- 1. सत्य, 2. असत्य, 3. सत्य, 4. सत्य, 5. असत्य, 6. सत्य।

जोड़ी मिलाइए

1. नगरीय समुदाय

2. जाति एक बन्द वर्ग है

3. जनांकिकीय समुदाय

4. ग्रामीण समुदाय

5. ग्रामीण-नगरीय निरन्तरता

6. नगर

(i) मजूमदार तथा मदान

(ii) जनसंख्या का आकार व घनत्व

(iii) जजमानी व्यवस्था

(iv) श्रम विभाजन तथा विशेषीकरण

(v) सामाजिक गतिशीलता

(vi) बर्ट्रेण्ड ने

उत्तर- 1. (v). 2. → (i). 3. → (ii). 4. (iii) 5. → (vi), 6. → (iv).

एक शब्द/वाक्य में उत्तर

1. जनसांख्यिकी का सर्वाधिक प्रसिद्ध सिद्धान्त किस राजनीतिक अर्थशास्त्री के नाम से जुड़ा है

2. जनसंख्या के विज्ञान को क्या कहते हैं ?

3. किसी भी समाज में सामाजिक-आर्थिक विकास का केन्द्र क्या होता है ?

4. राष्ट्रीय जनसंख्या आयोग का अध्यक्ष कौन है ?

5. प्रति हजार पुरुषों पर स्त्रियों की संख्या को क्या कहा जाता है ?

6. सबसे कम मृत्यु दर किस राज्य में है ?

उत्तर- 1. थॉमस रॉबर्ट माल्थस, 2. जनांकिकी, 3. जनसंख्या, 4. प्रधानमंत्री, 5. लिंगानुपात, 6. केरल

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. जनांकिकी का अर्थ समझाइए।

उत्तर-जनांकिकी वह विज्ञान है जो किसी समाज की जनसंख्या के आकार तथा उसमें होने वाली वृद्धि अथवा कमी से सम्बन्धित परिवर्तनों को स्पष्ट करता है। इसे जनासांख्यिकी भी कहा जाता है।

प्रश्न 2. जनांकिकी की तीन प्रमुख शाखाओं के नाम लिखिए।

उत्तर- (1) औपचारिक जनांकिकी, (2) सामाजिक जनांकिकी, तथा (3) आर्थिक जनांकिकी।

प्रश्न 3. भारत की सामाजिक जनांकिकी के क्या लक्षण हैं ?

उत्तर- (1) जनसंख्या वृद्धि की दर, (2) लिंगानुपात (3) आयु संरचना, (4) जनघनत्व आदि सामाजिक जनांकिकी के लक्षण है।

प्रश्न 4. जनांकिकी की कोई दो उपयोगिता बनाइए।

उत्तर-(1) समाज में सामाजिक-आर्थिक विकास का केन्द्र जनसंख्या होती है। इसी के आधार पर हम अपने साधनों का सही मूल्यांकन कर सकते हैं।

(2) रोजगार के अवसरों में वृद्धि का आधार जनसंख्या होती है।

प्रश्न 5. प्रतिस्थापन स्तर किसे कहते हैं ?

उत्तर- प्रतिस्थापन स्तर वह होता है, जब जन्म-दर और मृत्यु दर के बीच बहुत कम अन्तर रह जाने से जनसंख्या स्थिर हो जाती है।

प्रश्न 6. आयु संरचना से क्या तात्पर्य है ?

उत्तर- किसी समाज की कुल जनसंख्या के विभिन्न आयु वर्गों में व्यक्तियों का अनुपात आयु संरचना कहलाती है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1. भारत में जनांकिकी की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।

उत्तर भारत में जनांकिकी की प्रमुख विशेषताएँ-भारत में जनांकिकी को विशेषताएँ निम्नलिखित हैं (1) जनसंख्या का आकार-भारत एक विशाल देश है, जिसमें जनसंख्या का आकार भी बहुत विस्तृत है। (2) धर्मो और सम्प्रदायों का समावेश-भारतीय जनसंख्या में विभिन्न धर्मों और सम्प्रदायों से सम्बन्धित लोगों का समावेश होता है। ‘इस्लाम को मानने वाले लोगों की संख्या 17 करोड़ से भी अधिक है जो परिवार नियोजन के साधनों का उपयोग करना धर्म के विरुद्ध मानते हैं। अनेक जनजातियों के लोग भी परिवार नियोजन में विश्वास नहीं करते।

(3) साक्षरता-स्वतन्त्रता के बाद साक्षरता की दर दोगुनी से अधिक हो जाने के बाद भी भारतीय समाज के परम्परागत सामाजिक ढाँचे में कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुए।

(4) मृत्यु दर- जनसंख्या में शिशु मृत्यु दर आज भी काफी अधिक है। पुरुषों की तुलना में स्त्रियों का अनुपात कम होने और उन्हें स्वास्थ्य की कम सुविधाएँ मिलने के कारण सामाजिक संरचना में पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों की स्थिति आज भी कमजोर है।

(5) स्थान परिवर्तन की प्रवृत्ति-जनसंख्या में स्थान परिवर्तन की प्रवृत्ति लगातार बढ़ रही है जिससे ग्रामीण जनसंख्या में कमी हो रही है और नगरों की जनसंख्या तेजी से बढ़ती जा रही है।

प्रश्न 2. माल्थस का यह विश्वास क्यों था कि अकाल महामारी जैसी विनाशकारी घटनाएँ, जो बड़े पैमाने पर मृत्यु का कारण बनती हैं, अपरिहार्य हैं ?

उत्तर- अंग्रेज राजनीतिक अर्थशास्त्री थॉमस रॉबर्ट माल्थस का मानना था कि जनसंख्या वृद्धि का विस्तार ज्यामितीय या गुणोत्तर रूप से (जैसे-2, 4, 8, 16, 32 आदि की शृंखला में) होता है, वहीं कृषि का उत्पादन अंकगणितीय रूप से (जैसे-2, 4, 6, 8, 10 आदि की तरह) होता है। चूँकि जनसंख्या की वृद्धि की दर भरण-पोषण के संसाधनों के उत्पादन में होने वाली वृद्धि की दर से सदा आगे रहती है, इसलिए जनसंख्या की वृद्धि को नियन्त्रित करने के लिए कृत्रिम तथा प्राकृतिक निरोध अत्यावश्यक हैं। माल्थस का विश्वास था कि जनसंख्या पर नियन्त्रण का प्राकृतिक निरोध; जैसे- अकाल, बीमारियाँ, प्राकृतिक आपदाएँ इत्यादि अवश्वंभावी हैं। यह खाद्य आपूर्ति तथा जनसंख्या वृद्धि के बीच सन्तुलन स्थापित करने का प्राकृतिक तरीका है। प्राकृतिक निरोध काफी कष्टकारी तथा कठिन होता है। यद्यपि यह जनसंख्या तथा आजीविका के बीच सन्तुलन के लिए अपरिहार्य है।

प्रश्न 3. मृत्यु दर और जन्म-दर का क्या अर्थ है ? कारण स्पष्ट कीजिए कि जन्म-दर में गिरावट अपेक्षाकृत धीमी गति से क्यों आती है, जबकि मृत्यु दर बहुत तेजी से गिरती है।

उत्तर-जनांकिकी के अध्ययन में जन्म दर तथा मृत्यु दर का विशेष महत्त्व होता है। जन्म-दर- एक निर्धारित अवधि के दौरान किसी क्षेत्र में एक हजार व्यक्तियों के पीछे जितने बच्चे जन्म लेते हैं, उसे जन्म-दर कहते हैं। मृत्यु दर-एक निर्धारित अवधि के दौरान प्रति एक हजार व्यक्तियों के पीछे मरने वाले व्यक्तियों की संख्या को मृत्यु दर कहते हैं।

जन्म-दर पर मुख्य रूप से विवाह की आयु, प्रजनन क्षमता, वातावरण की स्थितियों, सामाजिक स्थितियों, धार्मिक विश्वासों तथा शिक्षा का प्रभाव पड़ता है। इसलिए यह उच्च बना रहता है, जबकि सार्वजनिक स्वास्थ्य के विभिन्न उपाय तथा चिकित्सीय प्रगति मृत्यु दर को नियन्त्रित कर लेती है। प्रत्येक व्यक्ति उच्च श्रेणी की बेहतर चिकित्सा तथा तकनीकी सेवाओं का सहारा लेता है। अतः जन्म-दर का सम्बन्ध चूँकि लोगों की मनोवृत्ति, विश्वास तथा मूल्य से हैं इसलिए जन्म दर में गिरावट अपेक्षाकृत धीमी गति से होती है और मृत्यु दर बहुत तेजी से गिरती है।

प्रश्न 4. ग्रामीण और नगरीय समुदाय के विभाजन को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- भारतीय समाज मुख्य तौर पर गाँवों और नगरों में बँटा हुआ है। इसलिए गाँवों के वर्गों की संरचना व रूप शहरों के वर्गों की संरचना व रूप से भिन्न है।

ग्रामीण और नगरीय समुदाय का विभाजन

ग्रामीण समुदाय

1. अधिकांश व्यक्ति कृषि कार्यों जीविका उपार्जित करते हैं।

2. व्यक्तियों का जीवन प्राकृतिक दशाओं से अधिक प्रभावित होता है।

3. ग्रामीण जीवन में जनसंख्या का घनत्व काफी कम होता है।

4. ग्रामीण समुदाय में लोग अपने क्षेत्र को छोड़कर दूसरे स्थान पर बसना नहीं चाहते।

नगरीय समुदाय

1. से अधिकांश लोग गैर-कृषि कार्यो; जैसे-व्यापार, निर्माण कार्य, उद्योग तथा विभिन्न प्रकार की सेवाओं से जीविका प्राप्त करते हैं।

2. मनुष्य द्वारा विकसित भौतिक और अभौतिक संस्कृति लोगों के व्यवहारों को प्रभावित करती है।

3. नगरीय समुदाय में जनसंख्या का घनत्व बहुत अधिक होता है।

4. यहाँ श्रम विभाजन और विशेषीकरण बढ़ने के साथ गतिशीलता भी अधिक होती है।

प्रश्न 5. भारत में गिरते स्त्री-पुरुष अनुपात के क्या कारण हैं ?

उत्तर- स्त्री-पुरुष अनुपात जनसंख्या में लैंगिक सन्तुलन का महत्त्वपूर्ण सूचक है। विगत शताब्दी में भारत में स्त्री-पुरुष अनुपात में लगातार गिरावट हो रही है। भारत के पाँच राज्यों और संघ राज्यों के क्षेत्रों में बाल स्त्री-पुरुष अनुपात प्रति 1000 पुरुष के पीछे 900. स्त्रियों से भी कम है। हरियाणा में तो बाल स्त्री-पुरुष अनुपात प्रति 1000 पुरुष के पीछे 885 है। भारत में स्त्री-पुरुष अनुपात में गिरावट आने के कई कारण हैं, जैसे-शैशवावस्था में बच्चियों की देखभाल की घोर उपेक्षा, लिंग विशेष का गर्भपात, बालिका शिशु की हत्या, गर्भस्थ शिशु का परीक्षण, बालिका भ्रूण को गर्भ में ही नष्ट कर देना। उपर्युक्त कारणों से स्त्री-पुरुष अनुपात लगातार गिर रहा है।

दीर्घ उत्तरीय/विश्लेषणात्मक प्रश्न

प्रश्न 1. भारत में जनसंख्या वृद्धि के कारण तथा प्रभाव लिखिए। इसके निवारण के उपाय बताइए।

उत्तर- सन् 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत की आबादी 1,210,193,422 है, जिसका अर्थ है कि भारत ने एक अरब के आँकड़े को पार कर लिया है। यह चीन के बाद दुनिया का सबसे ज्यादा आबादी वाला देश है। विभिन्न अध्ययनों से यह पता चला है कि सन् 2025 तक भारत चीन को भी पछाड़ देगा और विश्व का सबसे ज्यादा आबादी वाला देश बन जाएगा। इस तथ्य के बावजूद कि यहाँ जनसंख्या नीतियाँ, परिवार नियोजन और कल्याण कार्यक्रम सरकार ने शुरू किए हैं और प्रजनन दर में लगातार कमी आयी है।

| जनसंख्या वृद्धि के कारण भारत में आबादी बढ़ने के प्रमुख कारण निम्नलिखित है

(1) जन्म-दर का प्रतिशत मृत्यु दर से अधिक होना-भारत में मृत्यु दर के प्रतिशत को तो सफलतापूर्वक कम कर दिया है पर यही कार्य जन्म-दर के बारे में नहीं किया जा सकता। है। विभिन्न जनसंख्या नीतियों और अन्य उपायों से प्रजनन दर कम तो हुई है पर फिर भी यह दूसरे देशों के मुकाबले बहुत अधिक है।

(2) बाल-विवाह और सार्वभौमिक विवाह प्रणाली-वैसे तो कानूनी तौर पर लड़की की विवाह की उम्र 18 वर्ष है, लेकिन जल्दी विवाह की अवधारणा यहाँ बहुत प्रचलित है और जल्दी विवाह करने से गर्भधारण करने की अवधि भी बढ़ जाती है। इसके अलावा भारत में विवाह को एक पवित्र कर्त्तव्य और सार्वभौमिक विवाह प्रणाली माना जाता है।

(3) गरीबी और निरक्षता-आबादी के तेजी से बढ़ने का एक अन्य कारण गरीबी और निरक्षरता भी है। गरीब परिवारों में एक धारणा यह भी है कि परिवार में जितने ज्यादा सदस्य होंगे उतने ज्यादा लोग कमाने वाले होंगे। भारत अब भी गर्भ निरोधकों और जन्म नियन्त्रण विधियों के इस्तेमाल में पीछे है। कई लोग इस बारे में बात करना भी खुद की तौहीन समझते हैं। अज्ञानता के कारण छोटे परिवार के लाभों को नहीं जानते।

(4) पुराने सांस्कृतिक आदर्श-भारत में बेटे परिवार में पैसे कमाने वाले माने जाते हैं। इस दकियानूसी सोच के चलते माता-पिता पर बेटा पैदा करने का दबाव बहुत बढ़ जाता है।

(5) संयुक्त परिवार व्यवस्था- संयुक्त परिवार में बच्चों की देखभाल में कठिनाई नहीं आती है। साधनों की कमी के बाद भी अधिक सन्तानों के जन्म को प्राथमिकता दी जाती है जिससे जनसंख्या बढ़ती जाती है।

(6) जनसंख्या की प्रभावपूर्ण नीति की कमी-समय-समय पर जनसंख्या की अनेक नीतियाँ तैयार की जाती हैं तथा ‘एक राष्ट्र-एक सन्तान’ का नारा दिया जाता है। इसके बाद भी चीन की तरह जनसंख्या की किसी नीति को सभी धर्मों और क्षेत्रों के लोगों पर प्रभावपूर्ण ढंग से लागू नही किया जाता।

जनसंख्या वृद्धि के प्रभाव

आजादी के 73 वर्ष के बाद भी बढ़ती आबादी के कारण देश का परिदृश्य कुछ खास अच्छा नहीं है। जनसंख्या वृद्धि के प्रभाव निम्नलिखित हैं

(1) बेरोजगारी-भारत जैसे देश में इतनी ज्यादा आबादी के लिए रोजगार पैदा करना बहुत मुश्किल है। अनपढ़ लोगों की संख्या प्रतिवर्ष बढ़ती जा रही है इसलिए बेरोजगारी दर लगातार बढ़ती ही जा रही है।

(2) जनशक्ति का उपयोग-बढ़ती जनसंख्या के चलते आर्थिक मंदी, व्यापार विकास और विस्तार गतिविधियाँ धीमी होती जा रही हैं।

(3) संसाधनों का दोहन- भूमि क्षेत्र, जल संसाधन और जंगल सभी का बहुत शोषण हुआ है। संसाधनों में कमी भी आई है।

(4) घटता उत्पादन और बढ़ती लागत-खाद्य उत्पादन और विरतण बढ़ती हुई जनसंख्या की बराबरी करने में सक्षम नहीं है। इसलिए उत्पादन की लागत में वृद्धि हुई है, जो महंगाई बढ़ने का मुख्य कारण है।

भारत में जनसंख्या नियन्त्रण के लिए उपाय

भारत सरकार और नीति निर्माताओं को एक मजबूत जनसंख्या नियन्त्रण नीति बनाने के लिए पहल करनी चाहिए, जिससे देश की आर्थिक विकास दर का बढ़ती आबादी की माँग के साथ तालमेल बिठाया जा सके। महिलाओं और बच्चियों के कल्याण और उनकी स्थिति को बेहतर करना, शिक्षा के प्रसार गर्भनिरोधक और परिवार नियोजन के तरीके, यौन शिक्षा, पुरुष नसबन्दी को बढ़ावा और बच्चों के जन्म में अन्तर गरीबों के लिए ज्यादा स्वास्थ्य सेवा केन्द्र आदि कुछ ऐसे उपाय हैं, जो आबादी को काबू करने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।

प्रश्न 2. जनसांख्यिकी संक्रमण के सिद्धान्त के बुनियादी तर्क को स्पष्ट कीजिए। संक्रमण अवधि ‘जनसंख्या विस्फोट’ के साथ क्यों जुड़ी है ?

उत्तर- जनसांख्यिकीय संक्रमण एक जनसंख्या सिद्धान्त है। इस सिद्धान्त के प्रतिपादक डब्ल्यू. एम. थॉम्पसन 1929 और फ्रेंक डब्ल्यू. नोएस्टीन हैं। यह संक्रमण सिद्धान्त उच्च प्रजनन दर से न्यून प्रजनन दर और उच्च मृत्यु दर से न्यून मृत्यु दर के जनसांख्यिकीय प्रतिमान को दर्शाता है। जनसंख्या वृद्धि आर्थिक विकास के सभी स्तरों से जुड़ी होती है। जनसंख्या वृद्धि की तीन आधारभूत अवस्थाएँ होती हैं

(1) प्रथम अवस्था यह उच्च जन्म-दर एवं उच्च मृत्यु दर की धीमी जनसंख्या वृद्धि दर की अवस्था है। यह ऐसे देशों की विशेषता है, जहाँ समाज का ढाँचा परम्परावादी है। सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन के कारण इस प्रकार के समाजों में उच्च जन्म-दर व उच्च मृत्यु दर मिलती है।

(2) द्वितीय अवस्था- उच्च जन्म-दर एवं घटती मृत्यु दर इस अवस्था की विशेषता है। चिकित्सा सुविधाओं के विस्तार से मृत्यु दर में तो कमी होती है, परन्तु सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों में विशेष अन्तर नहीं होने के कारण जन्म-दर में अपेक्षित कमी नहीं आ पाती, इस अवस्था वाले देशों में खाद्यान्न की कमी प्रमुख समस्या होती है।

(3) तृतीय अवस्था- यह जनसंख्या वृद्धि में ह्रास की प्रवृत्ति की अवस्था है। साक्षरता में प्रसार, छोटे परिवार के प्रति जागरूकता एवं बढ़ते हुए सामाजिक आर्थिक विकास के कारण जन्म-दर में कमी आती है तथा मृत्यु दर भी घटती जाती है। इस अवस्था में धीमी जनसंख्या वृद्धि होती है। संक्रमण अवधि-इस अवस्था में जनसंख्या वृद्धि की काफी ऊँची होती है जबकि बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं, पोषण तथा आधुनिक चिकित्सा तकनीक के कारण मृत्यु दर में कमी आती है। उच्च वृद्धि दर के कारण बुनियादी सेवाओं तथा खाद्यान्न की कमी, अशिक्षा, बेरोजगारी आदि समस्याएँ जन्म ले लेती हैं इसलिए संक्रमण अवधि जनसंख्या विस्फोट से जुड़ी है।

प्रश्न 3. भारत में कौन-से राज्य जनसंख्या संवृद्धि के ‘प्रतिस्थापन स्तरों’ को प्राप्त कर चुके हैं अथवा प्राप्ति के बहुत नजदीक हैं ? कौन-से राज्यों में अब भी जनसंख्या संवृद्धि की दरें बहुत ऊँची हैं ? आपकी राय में इन क्षेत्रीय अन्तरों के क्या कारण हो सकते हैं ?

उत्तर- प्रतिस्थापन स्तर वह होता है जब जन्म-दर और मृत्यु दर के बीच बहुत कम अन्तर रह जाने से जनसंख्या स्थिर हो जाती है। जनसंख्या वृद्धि का प्रमुख सम्बन्ध जन्म-दर अथवा प्रजनन दर से है। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में जन्म-दर एक-दूसरे से बहुत भिन्न देखने को मिलती है। यहाँ केरल और तमिलनाडु ऐसे राज्य हैं जिनमें एक स्त्री औसतन 1-7 बच्चों को ही जन्म देती है। इसका अर्थ है कि यहाँ जन्म-दर जनसंख्या के प्रतिस्थापन-स्तर अथवा स्थिरता के स्तर से भी कम है। अनेक दूसरे राज्य ऐसे हैं जिनमें जन्म-दर काफी कम है। कर्नाटक, महाराष्ट्र, गुजरात, हिमाचल प्रदेश तथा पश्चिम बंगाल इसी तरह के राज्य हैं। इसके विपरीत बिहार, उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे बहुत अधिक जनसंख्या वाले राज्यों में आज भी जन्म-दर अधिक है। भारत में आज प्रतिवर्ष औसत जन्म-दर 2-4 है, जबकि बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान में यह क्रमश: 3-9,3.7 तथा 3-3 है। जनसंख्याविदों के अनुसार जन्म-दर 2-1 होने से ही इसे प्रतिस्थापन स्तर पर लाया जा सकता है। प्रतिस्थापन स्तरों तथा जनसंख्या संवृद्धि की दरों में क्षेत्रीय विभिन्नताएँ

(1) विभिन्न राज्यों की सामाजिक परिस्थितियाँ भिन्न-भिन्न हैं, जैसे- आतंकवाद, युद्ध जैसी स्थिति, उपद्रव की स्थिति आदि ।

(2) विभिन्न राज्यों के सामाजिक-सांस्कृतिक संस्कार लोगों का धार्मिक विश्वास है। कि बच्चे ईश्वरीय देन हैं इसलिए वहाँ संवृद्धि दर उच्च है।

(3) जो राज्य साक्षर हैं, वहाँ संवृद्धि दर कम है जबकि जहाँ साक्षरता की कमी है, अज्ञानता है, वहाँ संवृद्धि दर अधिक है।

(4) अत: सामाजिक, आर्थिक व भौगोलिक परिस्थितियाँ जनसंख्या संवृद्धि दर को प्रभावित करती हैं।

प्रश्न 4. जनसंख्या की ‘आयु संरचना’ का क्या अर्थ है ? आर्थिक विकास और संवृद्धि के लिए इसकी क्या प्रासंगिकता है ?

उत्तर- जनसंख्या की आयु संरचना का अर्थ है–किसी देश की आबादी की आयु संरचना, अर्थात् विभिन्न आयु वर्गों में व्यक्तियों का अनुपात इस अनुपात में तीन आयु वर्ग लिए जाते हैं

(1) 0-14 वर्ष- आश्रित वर्ग, अर्थात् बच्चे।

(2) 15 से 59 वर्ष-कार्यशील वर्ग, अर्थात् युवा।

(3) 60 वर्ष तथा उससे ऊपर-पराश्रितता वर्ग, अर्थात् बुजुर्ग निम्नलिखित सारणी से भारतीय जनसंख्या की आयु संरचना को समझा जा सकता है

इस सारणी से पता चलता है कि भारत देश में कार्यशील वर्ग सबसे अधिक है। 1961-2011 तक 15 से 59 वर्ष की आयु वाले लोगों का प्रतिशत 53 से बढ़कर 63 हो गया। इसके बाद आश्रित वर्ग की संख्या लगातार कम हो रही है। 1961-2011 तक बच्चों का प्रतिशत 41% से 29% हो गया। सबसे अन्त में पराश्रितता वर्ग जो कि 1961-2011 में 6% से 8% हो गया। इसका अर्थ यह है कि भारत में जन्म दर में क्रमश: गिरावट आ रही है और जीवन प्रत्याशा लगभग 63 वर्ष है जिस कारण इनकी संख्या कम है। आर्थिक विकास तथा संवृद्धि में आयु संरचना की प्रासंगिकता- इसका वर्णन निम्नलिखित है

(1) परिवार नियोजन की आवश्यकता को समझा जाने लगा है। 0-14 वर्ष की आयु वर्ग के लोगों के प्रतिशत में गिरावट यह प्रदर्शित करती है कि राष्ट्रीय जनसंख्या नीति का उपयुक्त ढंग से कार्यान्वयन हुआ है। भारत के सामाजिक सांस्कृतिक परिवर्तन तथा आर्थिक संवृद्धि के कारण जनसंख्या की आयु संरचना एक सकारात्मक युवा भारत की तरफ उन्मुख हो रही है।

(2) आर्थिक विकास तथा जीवन की गुणवत्ता में सुधार ने जीवन प्रत्याशा में वृद्धि की है।

(3) पराश्रितता अनुपात घट रहा है तथा कार्यशील जनसंख्या में वृद्धि भारतीय अर्थव्यवस्था में सकारात्मक संवृद्धि का संकेत दे रही है।

(4) चिकित्सा विज्ञान की प्रगति, सार्वजनिक स्वास्थ्य के विभिन्न उपायों तथा पोषण के कारण जीवन की प्रत्याशा बढ़ी है। यह आर्थिक विकास तथा संवृद्धि के कारण ही सम्भव हुआ है।

प्रश्न 5. ‘स्त्री-पुरुष अनुपात’ का क्या अर्थ है ? एक गिरते हुए स्त्री-पुरुष अनुपात के क्या निहितार्थ हैं? क्या आप यह महसूस करते हैं कि माता-पिता आज भी बेटियों की बजाय बेटों को अधिक पसन्द करते हैं ? आपकी राय में इस पसन्द के क्या-क्या कारण हो सकते हैं ?

उत्तर- स्त्री पुरुष अनुपात का तात्पर्य है कि प्रति 1000 पुरुषों के अनुपात में स्त्रियों की संख्या कितनी है ? इससे एक निश्चित समय पर समाज में स्त्री-पुरुषों के बीच संख्यात्मक समानता का आंकलन किया जाता है, जोकि जनसंख्या में लिंग-सन्तुलन का महत्त्वपूर्ण सूचक है। ऐतिहासिक रूप से विश्व के अधिकांश देशों में पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं की संख्या अधिक है क्योंकि बालिका शिशुओं में बाल शिशुओं की अपेक्षा रोग प्रतिरोधक क्षमता तथा बीमारियों से प्रतिरोध करने की क्षमता अधिक होती है, परन्तु पिछली एक शताब्दी से भी अधिक वर्षों से भारत में स्त्री-पुरुष अनुपात में बड़े पैमाने पर लगातार कमी आ रही है। 21वीं शताब्दी में प्रति 1000 पुरुषों पर स्त्रियों की संख्या घटकर 933 रह गई है। राज्य स्तर पर बाल लिंगानुपात भी चिन्ताजनक है। कम-से-कम 6 राज्यों तथा केन्द्रशासित प्रदेशों में बाल लिंगानुपात 793 से भी कम है। सर्वाधिक बाल लिंगानुपात सिक्किम (986) में है।

जी हाँ, दुर्भाग्य से भारत में अभी भी माता-पिता बालकों/लड़कों को प्राथमिकता देते हैं। इसके निम्नलिखित कारण हो सकते हैं

(1) सामाजिक तथा सांस्कृतिक कारण-कृषिगत समाज होने के कारण ग्रामीण जनसंख्या कृषि की देखभाल के लिए बालकों को अधिमान्यता देते हैं। केवल बेटा ही परिवार का वारिस माना जाता है तथा वंश को आगे बढ़ाने की इच्छा लोगों को लड़का प्राप्त करने के लिए प्रेरित करती है।

(2) धार्मिक तथा सांस्कृतिक विश्वास- ऐसा माना जाता है कि केवल बेटा ही अपने माता-पिता की अंत्येष्टि तथा उनसे सम्बद्ध रीति-रिवाजों को करने का हकदार है। आज भी बेटा प्राप्त करने के लिए बलि दी जाती है।

(3) आर्थिक कारण भारतीय समाज का प्रमुख पेशा कृषि है। ग्रामीणों का ऐसा मानना है, कृषिगत सम्पत्ति लड़कियों को नहीं दी जा सकती, क्योंकि शादी के बाद वे दूसरे गाँव, शहर या नगर में चली जाएँगी।

(4) जागरूकता तथा शिक्षा का अभाव- अज्ञानता तथा संकुचित प्रवृत्ति के कारण भारतीय समाज में लोग स्त्री को समान दर्जा नहीं देते। वे सोचते हैं कि बुढ़ापे में उनका बेटा ही सहारा होगा। केवल बेटा ही उनके खाने-पीने, आवास, परम्पराओं तथा अन्य जिम्मेदारियों को निभा सकता है।

(5) सामाजिक कुरीतियाँ-कई लोग सोचते हैं कि बेटी के विवाह पर बहुत सा दहेज देना पड़ेगा तथा विवाह के पश्चात् भी बहुत कुछ देना पड़ेगा। परन्तु बेटे के साथ तो दहेज आएगा। इस कारण बेटी की अपेक्षा बेटे को प्राथमिकता देते हैं। निष्कर्ष-यदि निम्न शिशु लिंगानुपात जारी रहा तो यह हमारी सामाजिक संरचना पर बहुत ही बुरा प्रभाव छोड़ेगा विशेष तौर से विवाह जैसी संस्थाओं पर।

प्रश्न 6. भारतीय समाज में ग्रामीण-नगरीय संयोजन का क्या अर्थ है ? भारतीय समाज में ग्रामीण-नगरीय संयोजन के वर्तमान आधारों की विवेचना कीजिए।

उत्तर- ग्रामीण-नगरीय संयोजन से आशय ग्रामीण एवं नगरीय जन-जीवन में रहन-सहन के स्तर में अन्य भौतिक संसाधनों के प्रयोग में समानता लाने से है, अर्थात् ग्रामीण-नगरीय विभाजन में कमी आने से है। भारतीय समाज में स्वतन्त्रता के बाद अनेक ऐसी दशाएँ उत्पन्न होने लगीं जिनकी वजह से ग्रामीण-नगरीय भेद में तेजी से कमी आई है।

(1) नई प्रौद्योगिकी- नई प्रौद्योगिकी के फलस्वरूप ग्रामीण और नगरीय समुदाय एक-दूसरे से जुड़ते जा रहे हैं। गाँवों में आज अनेक नई-नई तकनीकी वस्तुओं का उपयोग होने लगा है जिससे ग्रामीण समाज में नगरीय व्यवहारों को अपनाने की प्रक्रिया तेज हो गई है।

(2) लोकतान्त्रिक व्यवस्था स्वतन्त्रता के बाद देश में लोकतान्त्रिक व्यवस्था लागू की गई जिसके फलस्वरूप ग्रामीण एवं नगरीय समुदायों के संयोजन को काफी बल मिला है। भारत की एक-तिहाई जनसंख्या ग्रामीण होने के कारण भारत के सारे राजनीतिक दल गाँव के लोगों को अपने पक्ष में करने की कोशिश करते हैं जिससे गाँव में अनेक राजनीतिक गुट बन जाते हैं। इन गुटों द्वारा जब कोई आन्दोलन या प्रदर्शन किया जाता है, तो उसमें नगरीय विशेषताओं की झलक साफ मिलती है।

(3) सामाजिक समानताएँ-कुछ समय पहले तक नगर को एक विभिन्नतापूर्ण समाज और गाँव को एक समरूप समुदाय माना जाता था। आज अधिकांश गाँवों में विभिन्न धर्मों, जातियों एवं वर्गों के लोग साथ-साथ रहते हैं।

(4) सांस्कृतिक आदान-प्रदान-पूर्व काल में नगर और गाँवों की संस्कृति एक-दूसरे से बिल्कुल भिन्न है। आज गाँवों और नगरों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान बढ़ने से दोनों के सम्बन्ध अधिक मजबूत बनने लगे हैं।

(5) नई बाजार व्यवस्था- नई बाजार व्यवस्था भी ग्रामीण और नगरीय संयोजन का प्रमुख आधार बन गई है। ग्रामीण क्षेत्रों में नई बाजार व्यवस्था के परिणामस्वरूप अब आर्थिक प्रतियोगिता शुरू हो गई है। गाँवों में अब परम्परागत कृषि के स्थान पर नई तकनीकों द्वारा कृषि की जाने लगी है तथा अब व्यापारिक एवं नकदी फसलों के अधिकाधिक उत्पादन पर जोर दिया जाने लगा है, जिसकी वजह से लोगों की आर्थिक स्थिति में बढ़ोत्तरी होने लगी है तथा लोगों के बीच शहरी विशेषताओं को अपनाने की ललक बढ़ गई है।

(6) विकास कार्यक्रम-ग्रामीण विकास के वर्तमान कार्यक्रमों ने भी गाँवों और नगरों की दूरी को कम किया है। गाँवों में स्थित चिकित्सा केन्द्रों, स्कूलों और दूसरे विभागों के अधिकांश कर्मचारी भी नगरों से ही सम्बन्धित होते हैं। इन सभी दशाओं के फलस्वरूप ग्रामीणों के व्यवहार नगर की जीवन शैली से प्रभावित होने लगे हैं।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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