pariksha adhyayan class 11th इतिहास – HISTORY अध्याय 6 कार्यपालिका MP BOARD SOLUTION

अध्याय 6
कार्यपालिका

अध्याय 6 कार्यपालिका
अध्याय 6
कार्यपालिका

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

बहु-विकल्पीय प्रश्न

1. नाममात्र की तथा वास्तविक कार्यपालिका का भेद किस शासन में पाया जाता है
(i) एकात्मक (ii) संघात्मक
(iii) अध्यक्षात्मक (iv) संसदात्मक।

2. भारतीय राष्ट्रपति को किस श्रेणी में रखा जायेगा ?
(i) वास्तविक कार्यपालिका (ii) औपचारिक कार्यपालिका
(iii) एकल कार्यपालिका (iv) बहुल कार्यपालिका।

3. बहुल कार्यपालिका का श्रेष्ठ उदाहरण है-
(i) अमेरिकी राष्ट्रपति (ii) भारतीय राष्ट्रपति
(ii) ब्रिटिश मन्त्रिपरिषद् (iv) स्विस संघीय परिषद्।

4. भारत की संघीय कार्यपालिका है-
(i) राष्ट्रपति (ii) मन्त्रिपरिषद्
(iii) प्रधानमन्त्री (iv) उक्त तीनों से मिलकर बनी हैं।

5. निम्नलिखित में से किसने संसदीय सरकार को प्रधानमन्त्री सरकार की संज्ञा दी?
(i) मेरियट (ii) लॉस्की
(iii) क्रासमैन (iv) बेजहाट।

6. ‘ब्यूरोक्रेसी’ शब्द की उत्पत्ति किस भाषा से हुई?
(I) लैटिन (ii) फ्रांसीसी
(iii) रोमन (iv) हिन्दी।

7. ‘नौकरशाही’ शब्द सर्वप्रथम कहाँ प्रयोग हुआ था ?
(i) ब्रिटेन (ii) ऑस्ट्रेलिया
(iii) फ्रास (iv) जर्मनी।

8. ‘नौकरशाही’ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग किया था-
(i) द गार्ने ने (ii) जस्टिस हेवार्ट ने
(iii) मैक्स वेबर ने (iv) थाम्पसन ने।

9. नौकरशाही को मेज का शासन’ कहकर सम्बोधित किया था-
(i) लॉस्की ने (ii) फाइनर ने
(iii) पीटर ब्लाउने (iv) रैम्जे म्योर ने।

10. निम्नांकित में नौकरशाही का अवगुण नहीं है-
(i) जनसाधारण की माँगों की उपेक्षा
(ii) लाल फीताशाही
(iii) कार्य करने की विशिष्ट शैली
(iv) अधिकारियों में श्रेष्ठता की भावना।

उत्तर-1. (iv), 2. (i), 3.(iv), 4. (iv), 5. (iii), 6. (ii), 7. (ii) 8. (i), 9. (ii), 10. (iii).

रिक्त स्थान पूर्ति

1. कार्यपालिका में मुख्यतया राष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री, मन्त्रिपरिषद् तथा………. को सम्मिलित किया जाता है।
2. वर्तमान में भारत के राष्ट्रपति……….हैं।
3. राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी को……….रुपये जमानत राशि जमा करानी पड़ती है
4. राष्ट्रपति लोकसभा में बहुमत प्राप्त दल के नेता को ……….नियुक्त करता है।
5. उपराष्ट्रपति का कार्यकाल……….वर्ष है।
6. वर्तमान भारतीय प्रधानमन्त्री का नाम………है।
7. वर्तमान में राष्ट्रपति का मासिक वेतन
8. वर्तमान में उपराष्ट्रपति का वेतन ……….. रुपये है।
9. नौकरशाही शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग………के मध्य में किया गया।
10……….शब्द का प्रयोग ड्रॉअर वाली मेज अथवा लिखने की डेस्क के लिए होता था।
11. लिखने की डेस्क पर ढके कपड़े को ………कहा जाता था।
12. …………..संरक्षक नौकरशाही के लिए प्रसिद्ध है।

उत्तर-1. नौकरशाही,2. श्री रामनाथ कोविंद, 3. 15 हजार, 4. प्रधानमन्त्री, 5. पाँच, 6. श्री नरेन्द्र मोदी,7. पाँच लाख,
8. चार लाख,9.18वीं सदी, 10.ब्यूरो, 11. ब्यूरल,12.भारत।
जोड़ी मिलाइए

एक शब्द/वाक्य में उत्तर

1. सरकार का जो अंग कानूनों को लागू कराता है, उसे क्या कहते हैं ?
उत्तर-कार्यपालिका।
2. भारतीय राष्ट्रपति को पदमुक्त होने के पश्चात् कितनी वार्षिक पेंशन मिलती है?
उत्तर-₹ तीस लाख।
3. राष्ट्रपति तथा उपराष्ट्रपति को उसके पद एवं गोपनीयता की शपथ किसके द्वारा दिलायी जाती है?
उत्तर-क्रमश: भारत के मुख्य न्यायाधीश तथा राष्ट्रपति द्वारा।
4. किसका प्रमुख कार्य व्यवस्थापिका द्वारा बनाए गए कानूनों को क्रियान्वित करना है?
उत्तर-कार्यपालिका। 500
5. भारत में अनुच्छेद 352 का प्रयोग करते हुए राष्ट्रपति ने कितनी बार आपातकाल की घोषणा की है?
उत्तर-तीन बार।
6. राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी को कितने निर्वाचकों द्वारा प्रस्तावित एवं अनुमोदित होना जरूरी है?
उत्तर-पचास।
7. भारत के उपराष्ट्रपति कौन हैं ?
उत्तर-श्री वेंकैया नायडू।
8. भारतीय नौकरशाही का प्रमुख गुण लिखिए।
उत्तर-लाल फीताशाही।
9. “नौकरशाही के अन्तर्गत सभी लोकसेवक आते हैं।” यह किसने कहा था?
उत्तर-लापलोम्बरा ने।
10. फ्रांसीसी भाषा के ब्यूरो शब्द का क्या अर्थ होता है ?
उत्तर-विभाग।
11. “नौकरशाही मन्त्रीय उत्तरदायित्व की आड़ में फलती-फूलती है।” यह किमर कहा था?
उत्तर-रेम्जे म्योर ने।
12. जो लोग अपनी योग्यता तथा दक्षता के बल पर चुने जाते हैं तथा एक निश्चित कार्यकाल तक अपने पद पर बने रहते हैं, उन्हें क्या कहा जाता है?
उत्तर-स्थायी कार्यपालिका।

सत्य/असत्य

1. भारत के राष्ट्रपति के पद हेतु कम से कम 35 वर्ष की आयु होना आवश्यक है।
2. भारत के राष्ट्रपति के पद हेतु कम से कम 40 वर्ष की आयु होना आवश्यक है।

अथवा

भारत के राष्ट्रपति के पद हेतु कम से कम 25 वर्ष की आयु होना आवश्यक है।
3. डॉ. जाकिर हुसैन तथा फखरुद्दीन अली अहमद ऐसे राष्ट्रपति थे, जिनकी पद पर रहने हुए ही मृत्यु हो गयी थी।
4. मन्त्रिपरिषद् सदस्यों की तीन श्रेणियाँ-कैबिनेट मन्त्री, राज्य मन्त्री तथा उपमन्त्र हैं।
5. भारत में आजादी प्राप्त करने के बाद से अभी तक कोई व्यक्ति उप-प्रधानमन्त्री नहीं, बना है।
6. संविधान विरोधी कार्य करने पर राज्यपाल को जनता पदच्युत कर सकती है।
7. उपराष्ट्रपति का कार्यकाल 6 वर्ष है।
8. नौकरशाही वह संगठन है जो प्रशासन में अधिकतम कुशलता लाता है।
9. नौकरशाहों की कानूनों एवं नियमों में कोई आस्था नहीं होती है।
10. नौकरशाही कार्यों का क्रियान्वयन स्वेच्छा से करती है।
11. नौकरशाही कानूनों की अवज्ञा कभी नहीं कर सकती।
12. भारत में सिविल सेवा के सदस्यों की भर्ती का कार्यभार संघ लोक सेवा आयोग के सौंपा गया है।
13. जिला कलेक्टर (जिलाधिकारी) सामान्यतया भारतीय प्रशासनिक सेवा का अधिकारी होता है।

उत्तर-1.सत्य, 2. असत्य, 3. सत्य,4. सत्य,5. असत्य, 6.असत्य,. असत्ता 8. सत्य,9.असत्य, 10. असत्य, 11. सत्य, 12.सत्य, 13. सत्य।

अति लघु उत्तरीय प्रशन

प्रश्न1.कार्यपालिका से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-कार्यपालिका शासन का वह अंग है जो व्यवस्थापिका द्वारा बनाए गए कानूनों को कार्य रूप में परिणत करते हुए उसके आधार पर प्रशासन का संचालन करता है।

प्रश्क्त 2. कार्यपालिका कितने प्रकार की होती है ?
उत्तर-कार्यपालिका के प्रमुख प्रकारों में राजनीतिक एवं स्थायी, नाममात्र की एवं वास्तविक, एकल एवं बहुल तथा पैतृक कार्यपालिका का उल्लेख किया जा सकता है।

प्रश्न 3. भारत में नाममात्र तथा वास्तविक कार्यपालिका का अध्यक्ष कौन होता है?
उत्तर-भारत में नाममात्र की कार्यपालिका का अध्यक्ष राष्ट्रपति तथा वास्तविक कार्यपालिका का अध्यक्ष प्रधानमन्त्री होता है।

प्रश्न 4. पैतृक तथा बहुल कार्यपालिका वाले देशों के नाम लिखिए।
उत्तर- इंग्लैण्ड तथा जापान में पैतृक कार्यपालिका और स्विट्जरलैण्ड में बहुलवादी कार्यपालिका है।

प्रश्न-5 नौकरशाही का क्या अर्थ है ?
उत्तर- नौकरशाही का शाब्दिक अर्थ कार्यालय द्वारा शासन अथवा अधिकारियों द्वारा शासन है।

प्रश्न 6. नौकरशाही कितने प्रकार की होती है ?
उत्तर-नौकरशाही के प्रकारों में अभिभावक नौकरशाही, जातीय नौकरशाही, संरक्षक नौकरशाही तथा योग्यता नौकरशाही का उल्लेख किया जा सकता है।

प्रश्न 7. लूट प्रणाली से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर-लूट प्रणाली नौकरशाही का वह रूप है जिसमें लोक सेवकों की नियुक्ति योग्यता के आधार पर न होकर नियोक्ता की स्वेच्छा तथा राजनीतिक सम्बन्धों के आधार पर
की जाती है।

प्रारत 8. नौकरशाही के दोषों को दूर करने के उपाय बताइए।
उत्तर-नौकरशाही के दोषों को योग्य मन्त्रियों की नियुक्ति, सत्ता के विकेन्द्रीकरण, न्यायाधिकरणों की स्थापना तथा प्रत्यायोजित विधि निर्माण की मात्रा में कमी करके किया जा
सकता है।
प्रश्न 9. “भारत में एक दक्ष प्रशासनिक मशीनरी है।” स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-भारतीय लोकसेवक प्रशिक्षित एवं प्रवीण अधिकारी होते हैं। चूँकि वे अपने-अपने क्षेत्र एवं विषय के विशेषज्ञ होते हैं, अतः नीतियों को बनाने तथा लागू करने में वे राजनीतिज्ञों की मदद करते हैं।

लघु उत्तरीय

प्रश्न 1. राष्ट्रपति की वित्तीय शक्तियाँ लिखिए।
उत्तर-राष्ट्रपति को निम्नलिखित वित्तीय शक्तियाँ प्राप्त है-
(1) कोई भी वित्त विधेयक तब तक संसद के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया जा सकता है जब तक कि उसे राष्ट्रपति की पूर्व स्वीकृति प्राप्त न हो जाए।
(2) वित्त मन्त्री द्वारा प्रति वर्ष लोकसभा में बजट प्रस्तुत किया जाता है। संवैधानिक रूप से बजट को राष्ट्रपति द्वारा ही सदन में प्रस्तुत किया जाता है।
(3) राष्ट्रपति की वित्तीय शक्तियों में संघ एवं उसकी इकाइयों के बीच आय का उचित बँटवारा करना भी है।
(4) भारत की आकस्मिक निधि पर नियन्त्रण रखना राष्ट्रपति का वित्तीय अधिकार ही है।
(5) संविधान के अनुच्छेद 280 के अनुसार भारतीय राष्ट्रपति एक वित्त आयोग का गठन करता है। यह वित्त आयोग वित्तीय मामलों में राष्ट्रपति को परामर्श देने का कार्य करता है।

प्रश्न 2. राष्ट्रपति की संकटकालीन शक्तियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-दीर्घ उत्तरीय प्रश्न संख्या 4 का उत्तर देखें।

प्रश्न 3. राष्ट्रपति को कौन-कौन सी उन्मुक्तियाँ हासिल हैं ?
उत्तर- भारतीय संविधान द्वारा राष्ट्रपति को अनेक उन्मुक्तियाँ प्रदत्त की गयी हैं। अपने कार्यकाल में पद के अधिकारों एवं कर्तव्यों से सम्बन्धित किसी भी कार्य हेतु राष्ट्रपति को
न्यायपालिका के समक्ष उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता है। इसी तरह उस पर कोई फौजदारी का मुकदमा भी नहीं चलाया जा सकता है। कोई दीवानी कार्यवाही करने से पूर्व भी उसे दो माह पूर्व लिखित सूचना दिए जाने का प्रावधान है लेकिन इस सम्बन्ध में ठसकी अनुमति परमावश्यक
है। राष्ट्रपति को न तो गिरफ्तार किया जा सकता है और न ही उसे देश के किसी भी न्यायालय के सामने उपस्थित होने का आदेश ही दिया जा सकता है।

प्रश्न 4. उपराष्ट्रपति पद के लिए किसी प्रत्याशी में कौन-कौन सी योग्यताएँ आवश्यक हैं?
उत्तर-(1) वह भारत का नागरिक हो, (2) उसने न्यूनतम 35 वर्ष की आयु प्राप्त कर ली हो, (3) वह राज्यसभा का सदस्य चुने जाने की योग्यताएँ रखता हो, (4) वह शासकीय लाभ
के पद पर न हो, (5) उसके नाम का प्रस्ताव एवं समर्थन अलग-अलग बीस-बीस निर्वाचकों द्वारा किया गया हो, तथा (6) उसने ₹15 हजार की जमानत राशि जमा की हो।

प्रश्न 5. प्रधानमन्त्री की नियुक्ति किस प्रकार होती है ?
उत्तर- भारतीय प्रधानमन्त्री की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है लेकिन वास्तव में राष्ट्रपति प्रधानमन्त्री की नियुक्ति में स्वतन्त्र नहीं है, क्योंकि जिस व्यक्ति को भी लोकसभा में
बहुमत का विश्वास प्राप्त होगा, राष्ट्रपति को उसे ही प्रधानमन्त्री नियुक्त करना पड़ेगा। अतः लोकसभा में बहुमत प्राप्त दल के नेता को राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमन्त्री नियुक्त किया जाता है। जब किसी एक दल को लोकसभा में बहुमत नहीं मिलता, तब राष्ट्रपत्ति सबसे बड़े राजनीतिक बहुमत सिद्ध करने हेतु कहते हैं। दल के नेता को प्रधानमन्त्री नियुक्त करते हुए दी गई निर्धारित समयावधि में सदन में अपना

प्रश्न 6. लोकसभा के नेता के रूप में प्रधानमन्त्री के क्या अधिकार हैं ?
उत्तर- भारतीय प्रधानमन्त्री संसद का नेता होता है तथा वह उसका नेतृत्व करता है। प्रधानमन्त्री की इच्छानुसार ही संसदीय कार्यक्रमों का निर्धारण किया जाता है। संसद में सभी
महत्त्वपूर्ण घोषणाएँ भी उसी के द्वारा की जाती हैं। महत्त्वपूर्ण संसदीय समस्याओं का समाधान भी प्रधानमन्त्री के कुशल नेतृत्व में ही हो पाता है। जहाँ संसदीय अधिवेशन प्रधानमन्त्री को इच्छानुसार ही बुलाए जाते हैं, वहीं उसी के परामर्श पर राष्ट्रपति लोकसभा को भंग करता है।

प्रश्न 7. केन्द्रीय मन्त्रिपरिषद् में मन्त्रियों की श्रेणियों को लिखिए।
उत्तर-केन्द्रीय मन्त्रिपरिषद् में निम्न प्रकार के मन्त्री होते हैं-
(1) प्रधानमन्त्री केन्द्रीय मन्त्रिपरिषद् का अध्यक्ष प्रधानमन्त्री होता है।
(2) कैबिनेट मन्त्री-मन्त्रिपरिषद् के इस प्रकार में श्रेष्ठ श्रेणी के मन्त्री होते हैं तथा रक्षा, गृह, वित्त, रेल तथा विदेश इत्यादि महत्त्वपूर्ण विभाग इन्हीं के पास होते हैं। ये अपने दल
के वरिष्ठ नेता तथा साधारणतया प्रधानमन्त्री के निकट सहायक होते हैं।
(3) राज्यमन्त्री-ये कैबिनेट मन्त्री के सहायक होते हैं। अनेक बार, इनको स्वतन्त्र रूप से भी विभागों का प्रमुख बनाया जाता है।
(4) उपमन्त्री-इस श्रेणी के मन्त्री राज्य मन्त्रियों तथा कैबिनेट मन्त्रीगणों की सहायता हेतु होते हैं तथा किसी भी विभाग के स्वतन्त्र रूप से अध्यक्ष नहीं होते।

प्रश्न 8. मन्त्रिपरिषद् के कार्य लिखिए। (कोई तीन/चार)
उत्तर-मन्त्रिपरिषद् के चार कार्य निम्नवत् हैं-
(1) मन्त्रिपरिषद् का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कार्य घरेलू तथा विदेशी नीतियों का निर्धारण करना है।
(2) देश की आर्थिक नीतियों का निर्धारण भी मन्त्रिपरिषद् द्वारा ही किया जाता है।
(3) मन्त्रिपरिषद् आन्तरिक प्रशासन को संचालित करके प्रशासनिक व्यवस्था पर अंकुश लगाती है।
(4) मन्त्रिपरिषद् कानून बनवाने में अपना उपयोगी योगदान देती है। इसी प्रकार संवैधानिक संशोधन प्रस्ताव मन्त्रिपरिषद् द्वारा ही संसद में प्रस्तुत किया जाता है।

प्रश्न 9. मन्त्रिमण्डल तथा मन्त्रिपरिषद् में किन्हीं चार अन्तरों को लिखिए।
उत्तर-मन्त्रिमण्डल तथा मन्त्रिपरिषद् में निम्नलिखित अन्तर हैं-
(1) मन्त्रिमण्डल एक छोटी संस्था है, जिसमें प्राय: 15 से 20 तक सदस्य होते हैं जो कि कैबिनेट स्तर के मन्त्री कहलाते हैं। इसके विपरीत, मन्त्रिपरिषद् एक बड़ी संस्था है जिसके
सदस्यों की संख्या 40-50 तक होती है। इसमें प्रधानमन्त्री एवं तीनों श्रेणियों के मन्त्री सहित संसदीय सचिव भी होते हैं।
(2) प्रायः मन्त्रिमण्डल में सभी वरिष्ठ मन्त्री होते हैं जो महत्त्वपूर्ण विभागों के अध्यक्ष होते हैं, जबकि मन्त्रिपरिषद् कैबिनेट के सहायक के रूप में कार्य करती है।
(3) मन्त्रिमण्डल प्रशासन का केन्द्र है, जबकि मन्त्रिपरिषद् मन्त्रिमण्डल की सहायक संस्था है।
(4) मन्त्रिमण्डल की बैठकें नियमित रूप से होती हैं जिसमें सिर्फ कैबिनेट मन्त्री ही माग लेते हैं, जबकि मन्त्रिपरिषद् की बैठकें कभी-कभी होती हैं। राज्यमन्त्री एवं उपमन्त्री विशेष
रूप से बुलाने पर ही मन्त्रिमण्डल की बैठकों में सम्मिलित होते हैं।

प्रश्न 10. राज्यपाल की प्रमुख शक्तियों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-राज्यपाल की प्रमुख शक्तियाँ निम्नलिखित हैं-
(1) राज्य में सभी उच्च पदों पर नियुक्तियाँ करना तथा आपात परिस्थितियों में राज्य प्रशासन का संचालन करना राज्यपाल के अधिकार क्षेत्र में आता है।
(2) राज्य विधायिका के सदनों के अधिवेशन बुलाना एवं उनका स्थगन करना तथा विधानपरिषद् के 1/6 सदस्यों का मनोनयन करना राज्यपाल का विधायी अधिकार है।
(3) राज्यपाल वित्त विधेयकों पर स्वीकृति देता है तथा राज्य की संचित निधि पर अपना नियन्त्रण रखता है।
(4) निम्न न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति, सजा अथवा दण्ड को कम करने एवं स्थगित करने का अधिकार राज्यपाल की न्यायिक शक्तियों के अन्तर्गत आते हैं।

प्रश्न 11, राज्य प्रशासन में मुख्यमन्त्री की भूमिका को संक्षेप में समझाइए।
उत्तर-राज्य प्रशासन में मुख्यमन्त्री की भूमिका को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है-
(1) राज्य मन्त्रिपरिषद् का गठन मुख्यमन्त्री द्वारा किया जाता है। वह मन्त्रियों का चुनाव करता है तथा उनमें विभागों का बँटवारा करता है।
(2) विधानसभा में बहुमत प्राप्त दल का नेता होने की वजह से मुख्यमन्त्री अपने राज्य का भी नेता होता है। वह अपने राज्य का नेतृत्व करता है।
(3) मुख्यमन्त्री मन्त्रिमण्डल की बैठकों की अध्यक्षता करता है। इन बैठकों में जो भी फैसले लिए जाते हैं, वह उनको व्यापक रूप से प्रभावित करता है। मुख्यमन्त्री की इच्छा के
बिना राज्य का कोई भी प्रस्ताव अथवा नीति स्वीकृत नहीं हो सकती है।
(4) मुख्यमन्त्री, राज्यपाल एवं मन्त्रिपरिषद् के बीच एक कड़ी का कार्य करता है। समय-समय पर वह मन्त्रिमण्डल द्वारा लिए गए निर्णयों की जानकारी राज्यपाल को देता
है। किसी अन्य मन्त्री को यह शक्ति प्राप्त नहीं है। इसी प्रकार, राज्यपाल भी अपना सन्देश मन्त्रिपरिषद् तक मुख्यमन्त्री के माध्यम से ही पहुँचाता है।

प्रश्न 12. नौकरशाही का अर्थ एवं दो परिभाषाएँ लिखिए।
उत्तर-नौकरशाही अंग्रेजी भाषा के ‘ब्यूरोक्रेसी’ का हिन्दी अनुवाद है। ‘ब्यूरोक्रेसी का निर्माण फ्रांसीसी शब्द ‘ब्यूरो’ से हुआ, जिसका प्रयोग ड्रॉअर वाली मेज अथवा लिखने
की डेस्क हेतु किया जाता था। इस डेस्क पर ढके कपड़े को ब्यूरल कहकर सम्बोधित किया जाता था। इस आधार पर ‘ब्यूरो’ शब्द शासकीय कार्यों का परिचायक था। आगे चलकर
सरकार की निरंकुशता, संकुचित दृष्टिकोण तथा शासकीय अधिकारियों की स्वेच्छाचारिता को नौकरशाही कहा जाने लगा। नौकरशाही का आशय स्पष्ट करते हुए कहा जा सकता है कि यह एक कार्यकुशल, प्रशिक्षित तथा कर्त्तव्यपरायण कर्मचारियों का विशिष्ट संगठन है, जिसमें पदसोपान तथा आज्ञा की एकता के सिद्धान्त का सख्ती से पालन किया जाता है। रॉबर्ट सी, स्टोन के अनुसार, “इसका शाब्दिक अर्थ कार्यालय द्वारा शासन अथवा अधिकारियों द्वारा शासन है।”
फ्रेडरिक के शब्दों में, “पदसोपान, कार्य विशेषीकरण तथा उच्चस्तरीय क्षमता से परिपूर्ण एक ऐसा संगठन, जिन्हें उन पदों पर कार्य करने हेतु प्रशिक्षित किया गया है।”

प्रश्न 13. नौकरशाही के गुण लिखिए।
उत्तर-नौकरशाही के चार गुण निम्न प्रकार हैं-
(1) नौकरशाही समस्त कार्यों का क्रियान्वयन कानून एवं नियमों के अनुरूप करती है।
(2) इसमें प्रत्येक पदाधिकारी का कार्यक्षेत्र पूर्व निर्धारित होता है, जिससे बाहर वह कोई कार्य नहीं करता।
(3) नौकरशाहों को कार्य करने की शक्ति शासन से प्राप्त होती है।
(4) नौकरशाहों की कार्यालय प्रबन्ध व्यवस्था दस्तावेजों एवं फाइलों पर आधारित होती है।

प्रश्न 14. नौकरशाही के दो गुण एवं दो दोष लिखिए।
उत्तर-[नौकरशाही के दो गुण लघु उत्तरीय प्रश्न 13 के उत्तर से लिखें।
नौकरशाही के दो दोष निम्नवत् हैं-
(1) नौकरशाही का प्रमुख दोष इसकी रूढ़िवादी प्रवृत्ति है।
(2) नौकरशाही में कानूनों एवं नियमों के अनुरूप कार्य करने की वजह से अनेक बार जनसाधारण की माँगों एवं इच्छाओं को नकार दिया जाता है।

प्रश्न 15. नौकरशाही के दोषों को आप किस प्रकार दूर कर सकते हैं ?
उत्तर-नौकरशाही के दोषों को निम्नलिखित उपायों द्वारा दूर किया जा सकता है-
(1) नौकरशाही के अवगुणों को दूर करने हेतु सत्ता का विकेन्द्रीकरण कर दिया जाना चाहिए।
(2) नौकरशाही को अवगुणों से मुक्त करने हेतु ऐसे प्रशासनिक न्यायाधिकरणों की स्थापना किया जाना परमावश्यक है जिसमें नागरिक लोकसेवकों के खिलाफ अपनी शिकायतें दर्ज करा सकें।
(3) नौकरशाही को दोषों से मुक्ति दिलाने हेतु यह जरूरी है कि योग्य मन्त्रियों को नियुक्त किया जाये। इसका कारण यह है कि योग्य मन्त्री ही सरकारी सेवकों पर सुदृढ़ एवं प्रभावी नियन्त्रण लगा सकते हैं तथा उन्हें स्वेच्छाचारी होने से रोक सकते हैं।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

प्रशा1.राष्ट्रपति की महाभियोग प्रक्रिया को लिखिए।
उत्तर-राष्ट्रपति की महाभियोग प्रक्रिया
हालांकि भारतीय राष्ट्रपति का कार्यकाल पाँच वर्ष निर्धारित किया गया है, लेकिन संविधान का उल्लंघन करने पर उसे महाभियोग द्वारा कार्यकाल पूरा करने से पहले भी पर
से हटाया जा सकता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 61 द्वारा यह व्यवस्था की गयी है कि यदि राष्ट्रपति द्वारा संविधान का उल्लंघन किया जाता है तो संविधान में उल्लिखित प्रणाली की अनुसार उस पर महाभियोग की प्रक्रिया चलाकर उसे पदच्युत किया जा सकता है।
राष्ट्रपति पर महाभियोग लगाने का अधिकार भारतीय संसद के प्रत्येक सदन को हासिल हैं। राष्ट्रपति को हटाने की प्रक्रिया चलाने के लिए अभियोग चलाने वाले सदन की कुल संख्या
के एक-चौथाई सदस्यों के हस्ताक्षर होने जरूरी हैं। अभियोग चलाने के 14 दिन बाद अभियोग लगाने वाले सदन में उस पर विचार-विमर्श किया जाता है। यदि अभियोग का प्रस्ताव सदन
कुल सदस्य संख्या के दो-तिहाई सदस्यों द्वारा स्वीकृत हो जाए, तो उसके उपरान्त प्रस्ताव
दूसरे सदन को भेज दिया जाता है। दूसरा सदन इन अभियोगों की या तो स्वयं जाँच करेगा अथवा इस कार्य हेतु विशेष समिति का गठन करेगा। इस समय राष्ट्रपति स्वयं उपस्थित होकर अथवा अपने प्रतिनिधि द्वारा अपना पक्ष प्रस्तुत कर सकता है। यदि इस सदन में राष्ट्रपति के खिलाफ लगाए गए आरोप सही सिद्ध हो जाते हैं तथा दूसरा सदन भी अपने कुल सदस्यों के कम-से-कम दो-तिहाई बहुमत |
से महाभियोग के प्रस्ताव को स्वीकार कर लेता है, तब प्रस्ताव की स्वीकृति होने की तिथि से राष्ट्रपति पदच्युत समझा जाएगा।

प्रश्न 2. राष्ट्रपति की सामान्य कालीन शक्तियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-दीर्घ उत्तरीय प्रश्न संख्या 3 तथा 5 का उत्तर देखें।

प्रश्न3.राष्ट्रपति की कार्यपालिका (नियुक्ति) सम्बन्धी शक्तियों को लिखिए।
उत्तर- राष्ट्रपति की कार्यपालिका सम्बन्धी शक्तियाँ
भारतीय राष्ट्रपति की कार्यपालिका सम्बन्धी शक्तियाँ निम्न प्रकार हैं-
(1) पदाधिकारियों को नियुक्त करने सम्बन्धी शक्तियाँ-राष्ट्रपति लोकसभा में बहुमत प्राप्त दल के नेता को प्रधानमन्त्री नियुक्त करता है तथा उसी के परामर्श से अन्य मन्त्रियों की नियुक्ति भी उसी के द्वारा की जाती है। राष्ट्रपति को विभिन्न राज्यों के राज्यपाल, महाधिवक्ता, महालेखा परीक्षक, राजदूत एवं राजनयिक अधिकारी, लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष व सदस्यों तथा भारत के मुख्य न्यायाधीश सहित अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति इत्यादि की शक्ति प्राप्त होती है।
(2) अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र सम्बन्धी शक्तियाँ-विश्व के विभिन्न देशों के साथ समझौते एवं सन्धियाँ करना तथा विदेशी राजदूतों के प्रमाण-पत्र स्वीकार करना राष्ट्रपति की कार्यपालिका सम्बन्धी शक्तियों में ही आते हैं। भारतीय संघ
(3) सैनिक शक्तियाँ-राष्ट्रपति जल, थल एवं वायु सेना का प्रधान सेनापति है। अत: वह इन तीनों ही सेनाओं के अध्यक्षों को नियुक्त करता है। शुद्ध प्रारम्भ करने अथवा बन्द करने
की घोषणा भी उसी के द्वारा की जाती है।
(4) राज्यों के शासन पर नियन्त्रण-राष्ट्रपति राज्यों के शासन की भी देखभाल करता है। वह देखता है कि उनका शासन संविधान के अनुरूप ही संचालित हो रहा है अथवा नहीं।
किसी इकाई राज्य में शासन तन्त्र के विफल हो जाने पर राष्ट्रपति सम्बन्धित राज्य में आपातकाल की घोषणा करके वहाँ का शासन अपने नियन्त्रण में ले सकता है।

प्रश्न 4. राष्ट्रपति की संकटकालीन शक्तियाँ लिखिए।
राष्ट्रपति की संकटकालीन शक्तियाँ संविधान द्वारा राष्ट्रपति को निम्नलिखित तीन प्रकार की संकटकालीन शक्तियाँ प्राप्त
उत्तर-
(1) युद्ध, बाहरी आक्रमण अथवा सशस्त्र विद्रोह की स्थिति से सम्बन्धित संकटकालीन व्यवस्था- भारतीय राष्ट्रपति युद्ध, बाहरी आक्रमण अथवा सशस्त्र विद्रोह की स्थिति में संविधान के अनुच्छेद 352 का प्रयोग करते हुए आपातकाल की घोषणा कर सकता है। ऐसी घोषणा केन्द्रीय मन्त्रिमण्डल के लिखित परामर्श पर ही की जाएगी। आपातकाल की
घोषणा तुरन्त ही लागू हो जाती है, लेकिन एक माह की समयावधि के भीतर वह संसद के दोनों सदनों से स्वीकृत हो जानी चाहिए। संसद द्वारा अस्वीकृत होने पर यह रद्द हो जाएगी। यदि देश के नागरिकों को यह आभास हो कि आपातकालीन घोषणा अनावश्यक रूप से की गयी है, तो
वह इसे न्यायालय में चुनौती दे सकते हैं। अभी तक इस प्रकार की आपातकालीन घोषणा तीन बार (1962, 1971 तथा जून 1975 में) की जा चुकी है।
(2) राज्यों में संविधान की असफलता से उत्पन्न संकट-यदि किसी राज्य में संविधान के अनुसार शासन चलाना असम्भव हो जाए तो वहाँ अनुच्छेद 356 के अन्तर्गत राष्ट्रपति द्वारा आपातकाल की घोषणा की जा सकती है। घोषणा जारी किए जाने के दिन से एक माह की समयावधि के भीतर ही इसकी स्वीकृति संसद में हो जानी चाहिए। यह घोषणा • अधिक से अधिक एक वर्ष तक लागू रह सकती है। इस घोषणा का प्रभाव सिर्फ सम्बन्धित राज्य पर ही पड़ता है। राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू किए जाने की सर्वप्रथम घोषणा पंजाब
राज्य में की गयी थी। विभिन्न राज्यों में इस प्रकार की घोषणा अनेक बार की जा चुकी है।
(3) वित्तीय संकट- यदि देश की वित्तीय स्थिति अथवा साख को खतरा पैदा हो जाए तो राष्ट्रपति संविधान के अनुच्छेद 360 का प्रयोग करते हुए वित्तीय संकट की घोषणा कर
सकता है। घोषणा होने के बाद यह संसद से एक माह की समयावधि के भीतर ही स्वीकृत हो जानी चाहिए। वित्तीय आपातकाल की घोषणा का सम्बन्ध सम्पूर्ण देश अथवा उसके किसी हिस्से से होता है। देश में अभी तक इस प्रकार के संकटकाल की घोषणा नहीं की गयी है। इस संकट की अवधि में राष्ट्रपति को अधिकार है कि वह आर्थिक दृष्टिकोण से
किसी भी राज्य सरकार को आदेश दे सकता है। संघ तथा राज्य सरकार के अधिकारियों एवं कर्मचारियों के वेतन में, जिनमें उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश भी सम्मिलित हैं, आवश्यक कमी की जा सकती है।

मान 5. राष्ट्रपति की वित्तीय शक्तियाँ लिखिए।
उत्तर-राष्ट्रपति की वित्तीय शक्तियाँ
भारतीय संविधान द्वारा राष्ट्रपति को निम्नलिखित वित्तीय शक्तियाँ प्राप्त हैं-
(1) बजट प्रस्तुत कराना- भारत की प्रतिवर्ष की आय एवं व्यय के ब्यौरे अर्थात | बजट को संसद के समक्ष प्रस्तुत कराने का दायित्व राष्ट्रपति द्वारा ही निर्वहन किया जाता है।
(2) वित्त विधेयक प्रस्तुत कराना-वित्त सम्बन्धी कोई भी विधेयक राष्ट्रपति की पूर्व | स्वीकृति के बिना संसद में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता है।
(3) आय का वितरण-भारतीय संघ तथा उसकी इकाई राज्यों के बीच आय के वितरण की शक्ति भी राष्ट्रपति को ही होती है।
(4) अनुदान एवं करों पर सिफारिश-भारतीय राष्ट्रपति नये करों को लगाने के सिफारिश करता है तथा अनुदान की माँगों से सम्बन्धित कोई भी प्रस्ताव उसकी सिफारिश के बिना संसद में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।
(5) आकस्मिक निधि पर अधिकार- भारतीय राष्ट्रपति सरकार को आवश्यकता पड़ने पर संसद से पूर्व अनुमति लिए बिना आकस्मिक निधि से धनराशि दे सकता है।
(6) वित्त आयोग का गठन-संविधान के अनुच्छेद 280 द्वारा राष्ट्रपति को प्रति पाँच वर्ष बाद एक वित्त आयोग गठित करने का अधिकार प्राप्त है।

प्रश्न 6. भारतीय मन्त्रिमण्डल की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर-भारतीय मन्त्रिमण्डल की विशेषताएँ
भारतीय मन्त्रिमण्डल की प्रमुख विशेषताओं को निम्न बिन्दुओं द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है-
(1) भारतीय मन्त्रिमण्डल का कार्य राष्ट्रपति को सहयोग एवं परामर्श देना है लेकिन तकनीकी दृष्टिकोण से राष्ट्रपति मन्त्रिमण्डल का हिस्सा नहीं है। हालांकि मन्त्रिमण्डल द्वारा
प्रत्येक फैसला राष्ट्रपति के नाम पर लिया जाता है लेकिन इसमें न तो राष्ट्रपति का योगदान होता है और न ही इसके लिए उसे उत्तरदायी ठहराया जा सकता है।
(2) भारतीय मन्त्रिमण्डल की एक विशेषता यह भी है कि इसका व्यवस्थापिका के साथ सहयोग एवं सामंजस्य का गहरा सम्बन्ध रहता है।
(3) भारतीय मन्त्रिमण्डल अपने किए गए कृत्यों के लिए संसद के लोक सदन अर्थात् | लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी है। यदि लोकसभा किसी एक मन्त्री में अविश्वास | प्रकट करती है तो इसके फलस्वरूप सम्पूर्ण मन्त्रिमण्डल को त्यागपत्र देना पड़ता है।
(4) भारतीय मन्त्रिमण्डल की एक विशेषता यह भी है कि इसमें प्रधानमन्त्री का नेतृत्व होता है तथा वही मन्त्रिमण्डल का नेता एवं अध्यक्ष है। मन्त्रिमण्डल के परामर्श अथवा निर्णय
का अभिप्राय प्रधानमन्त्री का परामर्श या निर्णय ही है।
(5) भारतीय मन्त्रिमण्डल ब्रिटिश प्रणाली पर आधारित है।

प्रश्न 7. भारत में मन्त्रिपरिषद् की शक्तियाँ एवं कार्य लिखिए।
उत्तर-केन्द्रीय मन्त्रिपरिषद् की शक्तियाँ एवं कार्य
जा सकता है-
भारत में मन्त्रिपरिषद की शक्तियों एवं कार्यों को संक्षेप में निम्न प्रकार स्पष्ट किया
(1) नीतियों का निर्धारण- भारत में मन्त्रिपरिषद् की सबसे महत्त्वपूर्ण शक्ति राष्ट्र की घरेलू तथा विदेश नीति को निश्चित करना है। मन्त्रिपरिषद द्वारा समय-समय पर निर्धारित
नीतियों को संसद में मंजूर कराना पड़ता है।
(2) राष्ट्रीय कार्यपालिका पर नियन्त्रण-व्यवहार में भारतीय मन्त्रिपरिषद् ही आन्तरिक प्रशासन को संचालित करके प्रशासनिक व्यवस्था पर अंकुश लगाती है। युद्ध, शान्ति
तथा विदेश नीति का निर्धारण जहाँ मन्त्रिपरिषद द्वारा किया जाता है, वहीं राष्ट्रपति के अध्यादेश जारी करने के अधिकार का व्यावहारिक प्रयोग भी मन्त्रिमण्डल द्वारा ही किया जाता है।
(3) कानूनों को पारित कराने सम्बन्धी शक्ति-भारत में संसदात्मक शासन होने की वजह से मन्त्रिपरिषद् का कानून बनवाने में भी उपयोगी योगदान है। प्रत्येक शासकीय विधेयक
संसद में किसी न किसी मन्त्री द्वारा ही प्रस्तुत किया जाता है, जो पारित होने पर ही कानून का स्वरूप लेता है।
(4) वित्तीय शक्तियाँ- भारत की आर्थिक नीति का निर्धारण भी मन्त्रिपरिषद् द्वारा ही किया जाता है। मन्त्रिमण्डल देश का वार्षिक बजट बनाकर उसे संसद से स्वीकृत कराता है।
(5) संविधान संशोधन सम्बन्धी शक्ति-भारतीय संविधान में किसी भी संशोधन का प्रस्ताव मन्त्रिपरिषद् द्वारा ही संसद में प्रस्तुत किया जाता है। मन्त्रिपरिषद् यह फैसला भी करती
है कि संविधान के किस अनुच्छेद में संशोधन किया जाए।
(6) संकटकालीन शक्तियाँ-संघ की इकाई राज्य में जब राष्ट्रपति शासन लागू होता है तब राज्य के कार्यों को संचालित करने की वास्तविक शक्ति मन्त्रिपरिषद् में ही निहित
होती है।

प्रश्न 8.प्रधानमंत्री की शक्तियाँ एवं कार्य लिखिए।
उत्तर- प्रधानमन्त्री की शक्तियाँ एवं कार्य
प्रधानमन्त्री की शक्तियों एवं कार्यों को संक्षेप में निम्नलिखित प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है-
(1) मन्त्रिपरिषद् का निर्माणकर्ता-प्रधानमन्त्री को यह अधिकार है कि वह अपने इच्छित लोगों में से मन्त्रियों का चयन करके उसकी सूची राष्ट्रपति के पास भेजता है, जिसे
प्रायः राष्ट्रपति की स्वीकृति मिल जाती है। मन्त्रियों के बीच विभिन्न विभागों का वितरण भी प्रधानमन्त्री द्वारा ही किया जाता है। इस आधार पर कहा जा सकता है कि मन्त्रिपरिषद् का वही निर्माता है तथा उसे ही उसको समाप्त करने का अधिकार होता है।
(2) मन्त्रिपरिषद् का अध्यक्ष-मन्त्रिपरिषदों की बैठकों की अध्यक्षता प्रधानमन्त्री द्वारा ही की जाती है। इन बैठकों में जो फैसले लिए जाते हैं अथवा नीति निर्धारित की जाती है,
उस पर प्रधानमन्त्री का स्पष्ट प्रभाव होता है। उसकी इच्छा के खिलाफ मन्त्रिपरिषद् द्वारा कोई भी प्रस्ताव पारित नहीं किया जाता।
(3) उच्च स्तरीय नियुक्तियाँ – भारतीय राष्ट्रपति द्वारा जो भी उच्च स्तरीय नियुक्तियाँ की जाती हैं, वह असल में प्रधानमन्त्री के परामर्श के अनुसार ही की जाती हैं।
(4) शासन का प्रमुख वक्ता- भारतीय संसद एवं देश तथा विदेश में प्रधानमन्त्री शासन सम्बन्धी नीतियों का प्रमुख तथा अधिकृत प्रवक्ता होता है।
(5) शासन के विभिन्न विभागों में समन्वय-शासन के विभिन्न विभागों में समन्वय एवं एकता की स्थापना भी प्रधानमन्त्री द्वारा ही स्थापित की जाती है। उसके इस कार्य से सम्पूर्ण
शासन एक इकाई के रूप में कार्य करता है।
(6) अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में भारत का प्रतिनिधित्व-अन्तर्राष्ट्रीय जगत में भारतीय प्रधानमन्त्री का स्थान काफी महत्त्वपूर्ण है। विदेशों में उसके द्वारा दिए गए वक्तव्य को देश के नीतिगत विचार के रूप में स्वीकारा जाता है। प्रधानमन्त्री महत्त्वपूर्ण अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन में राष्ट्रीय प्रतिनिधि के रूप में विश्व समस्याओं पर विचार-विमर्श करने हेतु हिस्सा लेता है।
इसी तरह, अनेक बार कई देशों से महत्त्वपूर्ण समझौते करने हेतु वह सम्बन्धित देशों की याना पर भी जाता है।

प्रश्न 9.राज्यपाल की नियुक्ति किस प्रकार होती है ? राज्यपाल के कार्यकाल, वेतन, भत्ते एवं उसे मिलने वाली अन्य सुविधाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर- राज्यपाल की नियुक्ति
राज्यपाल राज्य की कार्यपालिका का संवैधानिक (औपचारिक) प्रधान है। संविधान के अनुसार राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। चूँकि राष्ट्रपति प्रत्येक कार्य प्रधानमन्त्री एवं उसकी मन्त्रिपरिषद् के परामर्श के अनुरूप करते हैं, अतः राज्यपाल की नियुक्ति
भी संघीय सरकार के परामर्श के आधार पर राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। कार्यकाल-राज्यपाल की नियुक्ति पाँच वर्ष की समयावधि के लिए की जाती है लेकिन वह अपने उत्तराधिकारी के पदग्रहण करने तक अपने पद पर बना रह सकता है। राज्यपाल को उसके 5 वर्ष के कार्यकाल के पूर्व भी राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकता है। इसी तरह, उसे एक राज्य से दूसरे में स्थानान्तरित भी किया जा सकता है।
वेतन एवं भत्ते-राज्यपाल के वेतन भत्तों का निर्धारण समय-समय पर संसद द्वारा किया जाता है। वर्तमान में राज्यपाल का वेतन ₹ तीन लाख पचास हजार प्रतिमाह निर्धारित है। वेतन के अतिरिक्त राज्यपाल को निःशुल्क आवास, विभिन्न प्रकार की भत्ते तथा सुविधाएँ
सकती है। प्रदान की जाती हैं। उसके कार्यकाल के दौरान इनमें किसी भी प्रकार की कटौती नहीं की जा

प्रश्न 10. राज्यपाल की शक्तियों एवं कर्तव्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-राज्यपाल की शक्तियाँ एवं कर्त्तव्य
भारतीय संघ की इकाई राज्यों के राज्यपाल को निम्नांकित शक्तियाँ हासिल होती हैं-
(1) कार्यपालिका शक्तियाँ-राज्यपाल सम्बन्धित राज्य की कार्यपालिका शक्तियों का स्वामी है, जिन्हें वह स्वयं अथवा अधीनस्थ पदाधिकारियों द्वारा स्थापित करता है। राज्य के
सम्पूर्ण कार्य को चलाने वाले राज्यपाल द्वारा मुख्यमन्त्री तथा. उसके परामर्श पर मन्त्रिपरिषद्कार्यपालिका के अन्य मन्त्रियों को नियुक्त किया जाता है। राष्ट्रपति सम्बन्धित राज्य के उल्न शयालय के व्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया के दौरान राज्यपाल से भी परामर्श करता है। राज्यपाल फैसलों की सूचनाएं हासिल करता है। अपने प्रशासनिक दायित्वों का पालन करते हुए मुख्यमन्त्री से समस्त महत्वपूर्ण नीतियों एवं
(2) विधायी शक्तियाँ-कोई भी विधेयक राज्यपाल की अनुमति के बिना न तो लागू किया जा सकता है कि न ही कानून का स्वरूप धारण कर सकता है। राज्यपाल को कुछ महत्त्वपूर्ण विधेयकों को राष्ट्रपत्ति के विचारार्थ सुरक्षित रखने की शक्ति भी हासिल है। राज्यपाल को विधानमण्डल के अवकाश काल में स्थिति की मांग के अनुरूप अध्यादेश जारी करने की शक्ति प्राप्त है। उसे मुख्यमन्त्री के परामर्श पर विधानसभा को भंग करने का अधिकार है।
(3) वित्तीय शक्तियाँ-राज्यपाल की पूर्व स्वीकृति के पश्चात् ही विधानसभा में धन विधेयक पेश किया जा सकता है। वह वित्तीय वर्ष प्रारम्भ होने से पूर्व वार्षिक वित्तीय विवरण
को विधानमण्डल के समक्ष प्रस्तुत कराता है, जिसमें आने वाले वर्ष की आय व्यय का विवरण होता है। राज्य संचित निधि पर राज्यपाल का नियन्त्रण होने के कारण वह इससे सरकार को अग्रिम धनराशि की स्वीकृति करता है।
(4) न्यायिक शक्तियाँ-राज्य कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में आने वाले अपराधियों
को क्षमा करने अथवा दण्ड को कम करने अथवा स्थगित करने की शक्ति भी राज्यपाल में
निहित है।

प्रश्न 11. राज्यपाल के विवेकाधिकार लिखिए।
उत्तर- राज्यपाल का विवेकाधिकार
राज्यपाल की स्वविवेकीय शक्तियाँ निम्न प्रकार हैं-
(1) राज्य में यदि संविधान के खिलाफ आचरण हो रहा हो, तो उस समय राष्ट्रपति को रिपोर्ट भेजते समय राज्यपाल अपने स्वविवेक का प्रयोग कर सकता है।
(2) राज्यपाल विधानमण्डल द्वारा पारित किसी भी विधेयक को राष्ट्रपति की स्वीकृति हेतु भेज सकता है।
(3) राज्य में राजनीतिक अस्थिरता पैदा होने पर राज्यपाल विधानसभा को भंग कर सकता है।
(4) नागालैण्ड तथा असम के राज्यपाल आदिम कबीलों तथा नागा विद्रोहियों के दमन के लिए अपने स्वविवेक का प्रयोग कर सकते हैं।
(5) हालांकि राज्यपाल द्वारा विधानसभा का अधिवेशन मुख्यमन्त्री के परामर्श से बुलाया जाता है, लेकिन विशेष परिस्थितियों में वह स्वविवेक से भी विधानसभा का अधिवेशन आहूत कर सकता है।

प्रश्न 12. राज्य मन्त्रिमण्डल की शक्तियाँ एवं कार्य लिखिए।
उत्तर-राज्य मन्त्रिमण्डल की शक्तियों एवं कार्य
राज्य मन्त्रिमण्डल की शक्तियाँ एवं कार्य अग्रवत् हैं-
(1) प्रशासनिक शक्तियाँ – राज्य के प्रशासन का सम्पूर्ण उत्तरदायित्व मन्त्रिमण्डल का होला है। राज्य के विकास हेतु नवीन योजनाएँ बनाना, शान्ति व्यवस्था स्थापित करना तथा
संघीय सरकार की योजनाओं एवं आदेशों को लागू करवाना मन्त्रिमण्डल का ही कार्य है।
(2) विधायी शक्तियाँ राज्य विधानमण्डल द्वारा कानूनों को पारित कराने की जिम्मेदारी मन्त्रिमण्डल की ही होती है। इसी प्रकार, विधानमण्डल के अधिवेशन बुलाने एवं स्थगित करने का फैसला भी मन्त्रिमण्डल द्वारा ही लिया जाता है।
(3) विनीय शक्तियाँ-राज्य का वित्तमन्त्री राज्य सरकार की आय-व्यय के विभिन्न स्रोतों का निश्चय करता है तथा अपने राज्य का वार्षिक बजट बनाकर विधानसभा में प्रस्तुत करके उसे पारित कराता है।
(4) न्यायिक शक्तियाँ-राज्य के उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति सम्बन्धी परामर्श मन्त्रिमण्डल के फैसले के अनुसार ही राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति को दिया जाता है।
इसी प्रकार, राज्यपाल के क्षमादान सम्बन्धी अधिकार का फैसला भी राज्य मन्त्रिमण्डल ही करता है।

(5) विधानमण्डल में सरकार का प्रतिनिधित्व-विधानमण्डल की बैठकों में
मन्त्रिपरिषद् के सदस्य सरकार के प्रतिनिधि के रूप में उपस्थित रहते हैं तथा सदन में पूछे गए
प्रश्नों का सन्तोषजनक उत्तर देते हैं।
प्र 13. मुख्यमन्त्री की शक्तियाँ एवं कार्यों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर- मुख्यमन्त्री की शक्तियाँ एवं कार्य
किसी राज्य के मुख्यमन्त्री की शक्तियों एवं कार्यों को निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है-
(1) मन्त्रिपरिषद् का निर्माण-मुख्यमन्त्री अपने इच्छित लोगों में से मन्त्रियों का चयन करके उसकी सूची राज्यपाल को सौंपता है, जिसे प्राय: राज्यपाल की स्वीकृति मिल जाती है।
मन्त्रियों की संख्या एवं उनके विभागों का वितरण मुख्यमन्त्री का ही अधिकार है।
(2) मन्त्रियों के कार्यकाल का निर्धारण-मुख्यमन्त्री जब चाहे किसी भी मन्त्री से त्यागपत्र ले सकता है तथा उसके विभाग में परिवर्तन कर सकता है। मन्त्री को बिना किसी
आपत्ति के उसके इस आदेश का पालन करना पड़ता है, अन्यथा की स्थिति में मुख्यमन्त्री राज्यपाल से उसकी बर्खास्तगी की अनुशंसा कर सकता है।
(3) सरकार का मुख्य वक्ता-राज्य सरकार का प्रमुख वक्ता होने की वजह से राज्य सरकार की तरफ से सभी प्रकार की घोषणाएँ मुख्यमन्त्री द्वारा ही की जाती हैं।
(4) वास्तविक नीति निर्धारक-मुख्यमन्त्री को राज्य के शासन की वास्तविक नीति निर्धारित करने का अधिकार हासिल होता है।
(5) नियुक्तियाँ सम्बन्धी शक्तियाँ-सैद्धान्तिक रूप से राज्य के अनेक उच्चाधिकारियों की नियुक्तियाँ राज्यपाल के द्वारा की जाती हैं, लेकिन व्यावहारिक रूप से इस शक्ति का प्रयोग
वास्तव में राज्य का मुख्यमन्त्री ही करता है।

प्रश्न 14. नौकरशाही की प्रकृति को समझाइए।
उत्तर- नौकरशाही की प्रकृति
मौकरशाही की प्रकृति को संक्षेप में निम्नलिखित दो दृष्टिकोणों के आधार पर किया
(1) संरचनात्मक दृष्टिकोण-इस दृष्टिकोण के आधार पर नौकरशाही एक ऐसी प्रशासनिक व्यवस्था है जिसके अन्तर्गत पदसोपान, विशेषीकरण तथा योग्य कार्यकर्ता इत्यादि
लक्षण विद्यमान होते हैं। इस दृष्टिकोण के प्रमुख समर्थक कार्ल फ्रेडरिक है।
(2) कार्यात्मक दृष्टिकोण-इस दृष्टिकोण के आधार पर नौकरशाही का अध्ययन सामान्य सामाजिक व्यवस्था की अन्य उपव्यवस्थाओं पर पड़ने वाले नौकरशाही व्यवहार के
प्रभाव का अध्ययन है। स्वयं नौकरशाही इस सामान्य सामाजिक व्यवस्था का एक हिस्सा, अर्थात् भाग होती है। इस दृष्टिकोण के प्रमुख समर्थक माइकेल क्रोजियर हैं।

प्रश्न 15. नौकरशाही के गुण बताइए।
उत्तर-नौकरशाही के प्रमुख गुण
नौकरशाही के प्रमुख गुणों को संक्षेप में निम्न प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है-
(1) कानूनों एवं नियमों में अटूट आस्था-नौकरशाही का प्रमुख गुण यह है कि यह सभी काम कानून एवं नियमों के अनुसार ही करती है।
(2) प्रत्येक पद का निर्धारित कार्यक्षेत्र-नौकरशाही में प्रत्येक पदाधिकारी का कार्यक्षेत्र पूर्व निर्धारित होता है तथा वह उससे बाहर कोई काम करने की स्थिति में नहीं होता। उदाहरणार्थ, जिलाधिकारी अपने जिले में ही सत्ता अथवा अधिकारों का प्रयोग कर सकता है, किसी दूसरे अन्य जिले में जाकर वह वहाँ के कार्यों में कोई हस्तक्षेप नहीं कर पायेगा।
(3) सत्ता का आधार राज्य एवं शासन का कानून-नौकरशाहों को कार्यों को क्रियान्वित करने की शक्ति शासन से हासिल होती है। यदि जनसाधारण नौकरशाहो के किसी अंग के खिलाफ आवाज उठाता है, तो इसका तात्पर्य यह होता है कि उस नागरिक ने देश के कानून को तोड़कर अपने हाथ में ले लिया है। किसी शासकीय कर्मचारी के काम में रुकावट
पैदा करने का अभिप्राय कानून का उल्लंघन करना है।
(4) प्राविधिक विशेषज्ञता-नौकरशाही का एक गुण उसकी विशिष्ट कार्य शैली है। चूँकि एक शासकीय कर्मचारी अपना समस्त जीवन एक विशिष्ट काम में लगा देता है, अत: वह उस कार्य विशेष में दक्षता हासिल कर लेता है।
(5) कागजी कार्यवाही-वर्तमान में कार्यालय प्रबन्ध व्यवस्था दस्तावेजों एवं महत्त्वपूर्ण फाइलों पर आधारित होती है। नौकरशाहों का प्रत्येक कार्य, फैसला तथा आदेश इत्यादि लिखित में होता है। फाइलें, पंचकास अथवा कम्प्यूटर, सी. डी. इत्यादि संस्था के स्मृति कोष हैं, जो आगे आने वाले समय में सही फैसला लेने में मददगार सिद्ध होते हैं।

प्रश्न 16. नौकरशाही के दोषों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-नौकरशाही के प्रमुख दोष अथवा अवगुण
नौकरशाही के प्रमुख दोषों अथवा अवगुणों को संक्षेप में अनलिखित प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है-
(1) जनसाधारण की माँगों की उपेक्षा-नौकरशाही का सबसे बड़ा दोष यह है कि इसमें कानूनों एवं नियमों के अनुरूप कार्य करने की वजह से कभी कभी जनसाधारण की मांगों
एवं इच्छाओं को नकार दिया जाता है।
(2) बड़े आकार से कार्यकुशलता में कमी-नौकरशाही अपना प्रभाव एवं शक्ति बढ़ाने हेतु अधिक काम न होने के बावजूद अपने आकार को बढ़ाती जाती है, जिससे कर्मचारियों की कार्यकुशलताओं का स्तर गिरता है तथा कार्य निष्पादन में अनावश्यक देरी होने लगती है।
(3) श्रेष्ठता की भावना-सत्ता हाथ में रहने तथा कुछ विशेषाधिकार मिलने से
नौकरशाह अपने आपको श्रेष्ठ तथा जनसाधारण को हीन समझने लगते हैं। इस प्रवृत्ति को वजह से शासकों एवं शासितों के बीच उचित सामंजस्य स्थापित करने में कठिनाई का सामना करना पड़ता है।
(4) रूढ़िवादी प्रवृत्ति-नौकरशाही का एक दोष इसकी रूढ़िवादी प्रवृत्ति भी है। चूंकि नौकरशाह यथास्थितिवाद के समर्थक होते हैं, अत: वे परिवर्तन एवं नवीनता के प्रति विरोधी भावना रखते हैं।
(5) निरंकुशता-चूँकि नौकरशाहों की प्रवृत्ति का झुकाव निरंकुशता की ओर रहता है, अतः इससे व्यक्तिगत स्वाधीनता खतरे में पड़ जाती है।
प्रश्न17.नौकरशाही की परिभाषा लिखते हुए उसके कोई पाँच स्वरूप लिखिए।
उत्तर-नौकरशाही की परिभाषा
नौकरशाही एक कार्यकुशल, प्रशिक्षित तथा कर्त्तव्यपरायण कर्मचारियों का विशिष्ट संगठन है, जिसमें पदसोपान तथा आज्ञा की एकता के सिद्धान्त का सख्ती से पालन किया जाता
है। रॉबर्ट सी. स्टोन के अनुसार, “नौकरशाही का शाब्दिक अर्थ कार्यालय द्वारा शासन अथवा अधिकारियों द्वारा शासन है।” लॉस्की के शब्दों में, “नौकरशाही सरकार की वह व्यवस्था है, स्वतन्त्रता का हनन होता है।” जिसका पूर्ण नियन्त्रण उच्चाधिकारियों के हाथों में रहता है तथा जिसके कारण

नौकरशाही का स्वरूप

नौकरशाही के स्वरूप अथवा प्रकृति को निम्न बिन्दुओं द्वारा स्पष्ट किया जा सकता
(1) नौकरशाही कानून एवं नियमों में अटूट आस्थावान होती है। अनेक बार लोकहित की उपेक्षा होने के बावजूद भी यह कानून व नियमों के अनुसार ही आचरण करती है।
(2) नौकरशाही पदसोपान सिद्धान्त पर आधारित होती है। अर्थात् प्रत्येक उच्चाधिकारी अपने से नीचे वाले अधिकारी को आदेशित करता है जो कि उसका परिपालन करता है।
(3) नौकरशाही कार्यों के तर्कसंगत विभाजन पर आधारित है। उत्तरदायित्व निर्धारण के समय इस तथ्य को दृष्टिगत रखा जाता है कि सम्बन्धित पदाधिकारी कितना सक्षम है।
(4) नौकरशाही में प्रत्येक पदाधिकारी का एक निश्चित नियन्त्रण क्षेत्र होता है, जिसका उल्लंघन सम्बन्धित अधिकारी द्वारा कदापि नहीं किया जाता है।
(5) नौकरशाही अपने प्रशासनिक अधिकारों का प्रयोग राज्य के कानून के अनुरूप करती है। अत: उसके कार्यों में व्यवधान डालने का अभिप्राय कानूनों का उल्लंघन करना है।

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